केतु स्तोत्र - Ketu Stotra


केतु: काल: कलयिता धूम्रकेतुर्विवर्णक:। 

लोककेतुर्महाकेतु: सर्वकेतुर्भयप्रद: ।।1।।


रौद्रो रूद्रप्रियो रूद्र: क्रूरकर्मा सुगन्ध्रक्। फलाशधूमसंकाशश्चित्रयज्ञोपवीतधृक् ।।2।।


तारागणविमर्दो च जैमिनेयो ग्रहाधिप:। 

पंचविंशति नामानि केतुर्य: सततं पठेत् ।।3।।


तस्य नश्यंति बाधाश्चसर्वा: केतुप्रसादत:।

 धनधान्यपशूनां च भवेद् व्रद्विर्नसंशय: ।।4।।

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